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छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव में लगता है भूतों का मेला : जानिए क्या होता है !

देखी कहा होताहै भुतोका मेला? क्यों आते है लोग 
चौरई और जुन्नारदेव के ग्रामीण अंचलों में लगने वाले ये मेले अपने पुराने इतिहास और परंपरा को लेकर अब तक चर्चाओं में है। इसमे विशेष भुतोका मेला है |
जुन्नारदेव के मालनमाई में लगने वाले मेले में जहां भूतों की पूजा की जाती है,वहीं दूसरी ओर चौरई के डोंगरदेव के  मेले में लोगों के द्वारा दो पत्थरों के बीच से निकाला जाता है। यह मेला पंद्रह दिनों तक लगता है | मेलेमे में इस दौरान हजारों लोग पहुंचते हैं।
विज्ञान की इस इक्कीसवी सदी में जब भारत चांद पर कदम रखने जा रहा है, भारत में ऐंसे कई हिस्से हैं जहां लोग भूतों की दुनिया पर विश्वास करते हैं, और उनके छुटकारा पाने के लिए तांत्रिक विधिका जरिया पसंद करते है |
घने जंगलों में मालनमाई देवी का मंदिर है। कहा जाता है कि यहा भूत प्रेतों की बाधाओं से मुक्ति मिलती है, आस्था और अंधविश्र्वास के इस बेजोड़ संगम में आदिवासियों का तीर्थ स्थल है, पूर्णिमा की रात यहां खास होती है। पूर्णिमा से अमावस तक यहां भक्त देवी की साधना भक्ति में डूबे रहते हैं,
मेले में भूतों से परेशान रोगियों के लिए मुक्तदाई होती है। भूतों से निजात दिलाने के लिए अपनी पहचान बना चुके इस मेले को लोग इसलिए भी भूतों का मेला कहते हैं क्योंकि  इस स्थान के आस पास निवासियों का कहना है कि पुराने समय में मालन माई की मूर्ति प्रगट हुई थी।
पूरी रात  होती है तंत्र साधना
देव उठनी ग्यारस से चालू हुऐ इस मेले में कार्तिक पूर्णिमा की रात आखरी रात होती है। जिन लोगों पर सैतानी साया, भूत-प्रेत, दैयत चुड़ैल एंव जिन-शैतानों, का साया होता है, भूतों से परेशान लोग यहां पर स्थित तालाब में डुबकी लगाकर मालनमाई की पूजा करते है।
ज्यादातर  लोगों का मानना है कि मालनमाई की पूजा से भूतों से निजात मिल जाती है। इसके विपरीत तांत्रिक शांति पाने की चाह में रात भर तंत्र साधना की जाती है। तांत्रिक अपने देव को खुश करने जहाँ जानवरों की बलि चढ़ाते हैं वाही  कपोल में त्रिशूल चुभाने से परहेज नहीं करते। है। इसे देखने वालों में सिर्फ ग्रामीण जन ही नहीं बल्कि पढ़ा लिखा सभ्य लोग भी पहुंचते है। पर ये बात अलग है की इस बात पर भारत के कितने लोग विश्वास करते है ?

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